Tuesday, August 24, 2010

स्वतंत्रता की उड़ान

स्वतंत्रता की उड़ान



पिछले दिनों हमने अपनी आज़ादी के ६२ साल पूरे कर लिए। हमें अपनी इस आज़ादी पर गर्व है और होना भी चाहिए, क्यूंकि आखिरकार इतनी लड़ाइयो और खून-खराबे के बाद हमे अंग्रेजी हुकूमत से आज़ादी जो मिली। लेकिन क्या सच में हम आज आज़ाद है ??? ये सोचने वाली बात है ! आज जहा देखो वहां भुकमरी, गरीबी, दंगे जैसी चीज़े देखी जा सकती है। मगर ये सारी चीज़े भी उतनी मायने नही रखती जितनी की आपसी प्रेम। आज हिंदुस्तान के प्राया हर राज्य में आरक्षण की आग लगी हूई है। दुनिया की सबसे बड़ी जनगणना आज भारत में हो रही है, ये अपने आप में एक विश्व रिकॉर्ड है। इस कारण आज भारत का जिक्र दुनिया के हर अखबार और टीवी चैन्नल्स में हो रहा है। मगर आज हर कोई जानता है की आज़ादी के बाद ये पहली बार होगा जब भारत की जनगणना जाति आधारित होगी। इस पर हर किसी का अपना तर्क है। एक तरफ जहा कांग्रेस गवर्नमेंट इसे जरुरी बताती है वही कुछ दिनों तक इसका विरोध करने वाली विपक्ष ने भी अब इसके लिए हरी झंडी दे दी है। इनका इरादा साफ़ है। जाति आधारित जनगणना करवा के आज ये पार्टिया अपना कल सुरक्षित करना चाहती है। ऐसा करके इन पार्टियों की छाती फूले नही समा रही। लेकिन क्या हम हिन्दुस्तानियों के लिए ये सचमुच गर्व का विषय है ?? मेरे हिसाब से तो बिलकुल भी नही। क्यूंकि हर शेत्र में आज इस कद्र आरक्षण दिया जा रहा है जैसे आरक्षण - आरक्षण ना होके बूंदी का लड्डू हो। और आने वाले समय में इसी आरक्षण की वजह से हम भारतीय आपस में लड़ने लगेंगे। उस समय हमे तोड़ने के लिए ना कोई आतंकवाद की जरुरत होगी और ना कोई न्क्स्सल्वाद की। क्यूंकि तब तक आरक्षणवाद ही इतना बढ़ जायेगा की ये बाकी सब चीजों को पीछे छोड़ जायेगा। और खुदा न करे शायद एक बार फिर भारत का बटवारा हो जाए। एक वो बटवारा था जिसने हमसे हमारे ही भाइयो को अलग कर दिया, उसी के जक्म आज तक भरे नही है और अगर इस जातिवाद ने भी हमला बोल दिया तो हिंदुस्तान का पतन निशित है। आज हिंदुस्तान में कमर तोड़ महंगाई है, लेकिन इसे कम करने का ध्यान किसी भी नेता को नही आता । आये दिन पेट्रोल - डीज़ल के दाम बढा दिए जाते है। और अब तो इन्हें सरकारी नियंत्रण से भी बाहर कर दिया है। इसका मतलब अब तेल कंपनियों की मनमानी तय है। मगर हमारे परम पूज्य, परम आदरणीय नेताओ को इन सबसे क्या मतलब ??? उनके लिए तो सब सरकारी कोटे से मुफ्त है। आज हमारे कृषि मंत्री को मण्डी का ताज़ा हाल पूछेंगे तो वो भी ना बता पाए, बतायंगे भी कैसे ? क्यूंकि उनका आधा समय तो क्रिकेट में चला जाता है। आखिर क्यों नेताओ को कई-कई विभाग में काम करने की आज़ादी दी गयी है ? क्या इस पर रोक नही लगनी चाहिए ? लेकिन इन प्रश्नों का आई .पी .एल के सामने कहाँ कोई औकात ?? सच तो ये है की आज भी हम स्वतंत्र होते हुए सवतंत्र नही है। आज भी भारत में ऑनर किलिंग जैसी घटनाये भारत को शर्मसार कर रही है। दो प्यार करने वाले एक नही हो सकते, कारण सिर्फ एक - धर्म, जाति। क्या यही हमारी पहचान है ?? क्या इतना काफी नही की हम भारतीय है ??? और क्या ये भी काफी नही की हम मनुष्य है ??? शायद ये काफी नही..इसलिए तो आज पंचायत उटपटांग गोष्णा कर देती है, इसलिए तो अपने धर्म में शादी ना करने पर माँ-बाप अपने ही जिगर के टुकडो को अपने से अलग कर देते है, मरवा देते है...आखिर ये सब क्यों ?????? सिर्फ झूठी शान की खातिर ! अरे क्या करोगे इस झूठी शान का जब तुम्हारे बुढापे का सहारा ही तुमसे दूर हो जाएगा ?? मैं तो सलाम करता हु ऐसे माँ-बाप को जो अपने बच्चो की पसंद को अपना लेते है। मैं सलाम करता हूँ उनको जो जातिवाद में विश्वास नही करते व् इसका पुरजोर विरोध करते हैं। आज देश के युवाओ को जरुरत है इन सभी चीजों के खिलाफ एक जुट होने की। तभी शायद हम एक स्वछ भारत की नीवं रख सकते हैं।



हमे सही मायने में स्वतंत्र होने के लिए आज किसी गांधी, नेहरु, बोस जैसे कर्मठ नेता चाहिए जो की अपनी जेबों की परवाह किये बगर राष्ट्र हित में काम करे और हिन्दुस्तान को हकीकत में भूक,बेरोजगारी, गरीबी, महंगाई और सबसे जरुरी जातिवाद से स्वतंत्र करवाए। तो आइये हम इस ६२ व़ी आज़ादी में ये प्रण लेवें की हम भारत को सच में एक स्वतंत्र देश बनाएंगे।

जय हिंद - जय भारत !



अनुपम दान...


Tuesday, July 20, 2010

अमेरिकेन चाय




इस आर्टिकल की हेडलाइन पढ़ कर आप सोच रहे होंगे के एक तो अमेरिकेन और उसके ऊपर से चाय। ये कैसा मिश्रण है ? तो भैया ऐसा है कि अमेरिकेन और चाय ये दोनों यहाँ नए ज़माने के है। चाय जिसे भारत कि खोज कहा जाता है, आज अमेरिकियो की मेज़ की शोभा बढ़ा रही है। अमेरिका में अधिकतर पेय पधारतो में या तो कोकाकोला, पेप्सी जैसे पेय होते है या अगर तरोताज़ा होना हो तो कॉफ़ी। चाय तो अमेरिकी जानते भी नहीं थे। मगर वक़्त ने कुछ ऐसी करवट ली की आज अमेरिकी बड़े स्वाद के साथ चाय का लुत्फ उठाते है। वक़्त तो वक़्त है, जब करवट लेता है तो पूरी दुनिया में। ऐसा तो है नहीं की वक़्त ने सिर्फ अमेरिका में ही करवट लिया और हिंदुस्तान में नहीं लिया। और भारत में चाय के मामले तो माशअलाह ऐसी करवट ली की मत पूछो, चाय का सबसे ज्यादा सेवन करने वाले देश ने ही चाय को ज़हर बता कर देश निकाला जैसे स्तिथि पैदा कर दी। कुछ सरफिरो ने हिंदुस्तान में यह बात उड़ा दी की चाय में कैफीन नामक ज़हर होता है। तो मिया कोई इनसे ये सवाल तो पूछे के भैया पिछले १०० सालो से भी ज्यादा से जब भारतीयों को चाय पीते कुछ नही हुआ तो अब क्या होगा ? हो सकता है ये वैज्ञानिक हो जिन्होंने ये बात कही हो, मगर मै इन्हें सरफिरा इसलिए कह रहा हु क्योंकि इन्होने हिंदुस्तान से उसकी सुबह कुशनुमा और शाम को तरोताज़ा करने वाली चीज़ हिन्दुस्तानियों से दूर की। और इसका नतीजा ये हो गया के आज अमेरिकियो की कॉफ़ी हम बड़े चाव से पीते है और अमेरिकी हमारी चाय को चुस्की मार-मार के हमे चिढाते है। चुस्की से याद आया, चाय को पीते वक़्त चुस्की लेके पीने का अपना अलग ही मज़ा होता था। गरमा-गरम चाय साथ में डुबाने के लिए बिस्कुट या फिर चाय का स्वाद बढ़ाने के लिए भजिये। अब इन चीजों का मज़ा कहा ? अब साहब आप ही बताइये के इन चीजों का मज़ा भला कॉफ़ी के साथ संभव है क्या ?? नहीं ना !

जब हम चाय पीते थे तो कप हुआ करते थे, पर अब कॉफ़ी के लिए मग हुआ करते है और उसमे भी नयी टेकनोलोजी की बदौलत अपनी या अपनी फैमिली की फोटो मग में लगा सकते है। चाय के कप की तो बात ही अलग होती थी। छोटी सी कप, उसमे तरह-तरह के डिजाइन्स, वाह ! देख के ही दिल खुश हो जाए। हालांकि कुछ कर्मठ लोगो ने, लोगो को चाय की ओर आकर्षित करने के लिए चाय की कई वैराइटीस बाज़ार में उतारे। मसलन येल्लो टी, वाईट टी, हर्बल टी....इत्यादि। मगर ये सारी चाय कुछ खास लोगो तक ही सिमित रह गयी। आम लोग आज भी संपूर्ण भारतीय रेड टी पीकर ही खुश है जैसे "मै", एक आम आदमी, एक आम सा
आर्टिकल "अमेरिकेन चाय " की चुसकिया लेकर लिखते हुए खुश हु.............................................................. :-)

अनुपम दान

Monday, July 19, 2010

रूपए का मूल्य



रूपए का मूल्य

हिंदुस्तान, एक ऐसा देश है जहा प्यार है, भाईचारा है और सबसे बड़ी चीज़ आगे बढ़ने की ललक है। आज हिंदुस्तान की आर्थिक स्तिथि में जिस तेज़ी क साथ सुधर हुआ है, शायद ही इतनी तेज़ी से किसी दूसरे देश में हुआ हो। आज से कुछ समय पहले जब पूरे विश्व में आर्थिक मंदी ने लोगो की कमर तोड़ दी थी और कई देशो को कंगाली की राह पर खड़ा कर दिया, उस समय जो निष्ठा और हिम्मत भारत ने दिखाई, उसे देख बड़े-बड़े समृद्ध देश भी सोचने पर मजबूर हो गये। आज भारत एक ऐसे मुकाम पर खड़ा है जहा बड़ी सी बड़ी कंपनी अपने पैर जमाना चाहती है। भारत ने भी दिलेरी दिखाते ही हर कंपनी का स्वागत बड़ी जोशखरोश के साथ किया। आज भारत में शायद ही कोई ऐसा ब्रांड हो जिसने अपना कारोबार यहाँ शुरू न किया हो। भारत आज पूरी दुनिया को आकर्षित कर रहा है, आज सारी कंपनियों को यहाँ अपार संभावनाए नज़र आ रही है। भारत भी अपनी ओर से कोई कमी नहीं करना चाहता, और शायद यही वजह है की भारत ने रूपए का नया प्रतीक चिन्ह सामने लाया है, और इसके पेश करते ही प्रतीक चिन्ह इस्तेमाल करने वाले देशो में भारत पांचवे नंबर पर आ गया। और अब भारत की यह कोशिश है कि ये चिन्ह पूरे विश्व में भारतीय मुद्रा लिखते वक़्त प्रयोग में लाया जाए। इसके लिए कोशिश जारी है और अगले ६ महीनो में भारत में पूरे तरीके से इसे अपना लिया जायेगा और अगले दो वर्षो में पूरा विश्व इसका इस्तमाल करने लगेगा।

नए प्रतीक पर गौर फ़रमाया जाये तो ये पता चलता है कि ये चिन्ह अपने अन्दर नए भारत कि नयी सोच लिए हूए है। इसमें आपको भारत क़ी महान संस्कृति और नयी सोच का पता चलता है, नया चिन्ह असल में देवनागरी और रोमन का समागम है। आईटी शेत्र में पहले ही परचम लहरा चुके भारत अब कंप्यूटर कीबोर्ड पर इसे अंकित करना चाहता है, ताकि भविष्य में इसके इस्तेमाल में सरलता हो सके। अब तक सिर्फ अमेरिकी $ ही कीबोर्ड पर अपनी जगह पक्की कर पाया है, पर भारत को आशा है कि जल्द ही कीबोर्ड की शान बढ़ने और $ का साथ निभाने हमारा प्रतीक चिन्ह प्रचलन में आएगा। इसी से साबित होता है की भारत आज कितने आगे की सोच रहा है। खुद अमेरिका के राष्ट्रपति बरैक ओबामा ने अमेरिका से कहा है के वो दिन दूर नहीं जब हम भारत से हम पिछड़ जाए। उनके इस भाषण को जापान, ऑस्ट्रेलिया जैसे कई समृद्ध देशो ने अपनी भोहें चौव्डी करके मजाक में नहीं लिया है। हाल ही के दिनों में पेपर में एक खबर छापी थी की २०२० तक भारत अमेरिका को भी पीछे छोड़ सकता है। और अगर ऐसा होता है तो ये कोई आशार्य की बात नहीं।

एक वक़्त था जब हमारे बच्चे पढ़ -लिख कर विदेशो में नौकरी क लिए जाया करते थे, पर कहते है ना वक़्त बदलते देर नहीं लगती। और इस केस में तो ज्यादा देर भी नहीं लगी। आज हमारी युवा पीढ़ी ना केवेल उच्छ शिक्षा यहाँ भारत में पाती है, बल्कि बड़ी-बड़ी मल्टीनेशनल कंपनियों के यहाँ आ जाने से अब हमारी युवा पीढ़ी यहीं भारत में रह कर भारत को आगे बढ़ने में मदद करती है। उल्टा अब तो विदेशो से लोग भारत आकर पढाई वा नौकरी कर रहे है। भारत में मेडिकल फैसिलिटी भी दुसरे देशों के मुकाबले कम कर्चिला होने के कारन कई देशों से अब लोग अपना इलाज़ करने यहाँ आते है और पूर्णताँ ठीक होकर जाते है। विदेशियों के मन में जो पहले साँप, हाथी और राजाओं की छवि थी भारत की वो अब धूमिल हो गयी है और अब नए भारत न सिर्फ लोग जानते है बल्कि उसे सराहते भी है। विकासशील देशो में शुमार भारत, अपनी चाहत, जिद, मेहनत और इच्छाशक्ति के बलबूते पर विक्सित देश होने की राह की ओर अग्रसर है और रूपए के मूल्य को जानते हूए उसने जो प्रतीक चिन्ह दुनिया के सामने रखा है उसे हम विक्सित होने की ओर बढ़ाये कदम समझ सकते है। आजका आधुनिक भारत, सूरज की रौशनी के सामान पूरे विश्व में अपनी छठा बिखेर रहा है।